कॉलेज की फस्ट सेमिस्टर की एग्जाम हो चुकी थी। मैं और विजय हमारी कमरे में बैठे थे। कुछ काम भी नहीं था। बाहर जोरों से बारिश हो रहीं थी। हम बाहर भी नहीं जा सकते थे। विजय ऊपर के पंखे को देख रहाँ था। मुझे लगा की कुछ रहा होगा। मुझे भी कुछ पढ़ने का मन नहीं कर रहा था। कुछ महीनों पहले मुझे विजय एक अनजान लड़का था। लेकिन अब मैं उसके बारें मैं बहुत कुछ जान चूका था। सच में प्रकृति ने उसको तेज दिमाग दिया था। उसकी सोचने की क्षमता सबको हैरान करती थी। किसी अपराध में घटी घटना का सम्बन्ध जोड़ना हो या कसी परेशानी का हल ढूँढना हो, उसमे वो माहिर था। उसको अपराध की तल तक जाना , गुनाह ,अपराध की तह तक जाना, ये सब उसका एक तरह का पैशन था। हर चीज को बारिकता से देखना, घटित घटनाओ का अनुमान लगाकर घटना के तह तक जाना, ये सब उसे बहुत अच्छी तरह से आता था।
शाम के ६ बजे थे। बारिश भी काम हो गयी थी।
"राघव कमरे बेंठ के बहुत बौर हो गया हूँ। चल जरा बाहर घूम आतें हैं। "
"हाँ। मुझे भी बहुत बौर हो रहा हैं। चलो !"
हम दोनों फ्रेश होकर बाहर घूमने गए। बारिश का पानी रस्ते पर कहीं जमा हुआ था। हम दोनों फुटपाथ से चले जा रहें थे। तभी हमारे पास के बिल्डिंग के निचे कुछ पुलिस और कुछ लोग दिखे।
"विजय , वहां देखो पुलिस हैं। लगता हैं शायद कुछ तो जरूर हुआ हैं। "
"हाँ, चल देखते हैं। शायद खून या फिर चोरी ही हुई होगी। "
हम वहाँ पर गए तो हमें एक पुलिस कांस्टेबल ने रोका। विजय ने उसके पास का उसका ID दिखाया। हम अंदरगए तो बिल्डिंग के ३ रे फ्लौर पर एक वयस्क पुरुष की डेड बॉडी उसके घर में पड़ी थी। वहाँ पुलिस इंस्पेक्टर ने हमें देखकर हमसे पूछताछ की। विजय ID दिखाते ही उसने हमको नाराजी से अंदर आने दिया। विजय ने जब उस डेड बॉडी को देखा तो उसके आँखों में एक चमक सी उठीं।
पास में ही उस पुरुष का बेटा और उसकी बहु बैठकर रो रहे थे। विजय ने उनसे बात की।
" कब हुआँ ये सब ? "
" हम दोनों मार्किट गए थे। तब हमारे पिताजी अकेले घर पर थे। जब वापस आये तो उनको, यहाँ बांधकर रखा था। और उनकी हत्या की। "
"लेकिन ये किया किसने ? यहाँ और कौन था ?"
"लोई नहीं। सिर्फ हम तीनों ही रहते हैं यहाँ। "
विजय ने पुलिस इंस्पेक्टर से बात की।
" सर क्या कोई चोरी हुई है क्या यहाँ पर ?"
इंस्पेक्टर ने गुस्से से कहाँ ,"नहीं ! शायद चोर नहीं था। कोई खुनी ही आया था। हत्या ही उसका इरादा था। "
विजय ने डेड बॉडी का अच्छी तरह से निरिक्षण किया। करीब ६२ की उम्र के बुजुर्ग थे।अमित दुबे नाम था। सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे। २ साल पहले ही वो रिटायर हुई थे। उनको रस्सी से कुर्सी बाँदकर रखा था। उनकी छाती की बाये और चाकू से वार किया था। विजय ने पूरी तरह से नजदीक जाकर देखा। मुझे तो बहुत डर लग रहा था। विअज्य ने उनके पड़ोसीओँ बात की तो उन्होंने बताया की बेटा राकेश बहुत ही सराबी हैं। वो हर रोज शराब पीकर अत था और उसके पिताजी को बिज़नेस के लिए पैसे मांगता था। २ दिन पहले ही उनका जोरों का झगड़ा हुआ। राकेश ने किसी इंसान से पैसे लिए थे। उस आदमी ने राकेश को १० दिन की मोहलत दी थी। अगर उसने पैसे नहीं दिए तो वो उसको सबक सिखाएगा। ऐसी धमकी दी थी। अमित के रिटायरमेंट के कुछ पैसे मिलाने वाले थे। लेकिन उसको बहुत समय था।
विजय वापस उस डेड बॉडी के पास आया। उसने फिर से सब कुछ अच्छी तरह से देखा। तभी वहां बिमा एजेंट आ गए। उन्होंने अमित जी की बॉडी देखि और पुलिस की हत्या की सर्टिफिकेट लेने गए। तभी विजय जोर से चिल्लाया इंस्पेक्टर सर जरा इधर आईये। उसको कुछ तो मिला था।
" सर जरा बॉडी को गौर से देखें। हातो की रस्सी जिस तरह से बंधी हुई हैं , उससे लगता हैं की रस्सी किसी और ने नहीं बल्कि खुद अमित जी ने ही लगाई हैं। "
सब ने देखा तो सच में ही रस्सी की गांठ कमजोर थी और अच्छी तरह से बंधी नहीं थीं।
तभी विजय ने फिर से कहाँ," सर ये देखें यहां ये चीज जो बॉडी के बिलकुल सामने हैं और उसमे चाकू के आकर के छेद हैं। "
उस चीज को ध्यान से निकला गया। उसको खोला गया। उसमे कुछ मैकेनिज्म की मदद से एक गुलेल की तरह रचना की गयी थी।विजय ने पास ध्यान से देखा। तभी उसे वहां कुछ छोटेसे रिमोट की तरह मिला। उसने जब उस रिमोट का बटन दबाया तो उस गुलेल की स्प्रिंग छूट गयी। विजय को सब कुछ समज आया।
"इंस्पेक्टर साहब मुझे लगत हैं की ये खून नहीं बल्कि आत्महत्या हैं। "
" और तुमको ये कैसे पता चला ?"
" सर , ये रिमोट पर चलने वाली चीज और ये रस्सी की गांठ का कमजोर होना ये सब यहीं दर्शाता हैं की ये प्लान कर की हुई आत्महत्या हैं। "
"लेकिन क्यों?"
" शायद बिमा के पैसे लिए।"
इंस्पेक्टर ने बिमा एजेंट को बुलाया और बिमा की रकम पूछी। तो उसने १ करोड़ बिमा की रकम बताई।
" बेटे को पैसों की अड़चन से दूर करने के लिए , अमित जी ने ये निर्णय लिया होगा। सॉफ्टवेयर इंजीनियर होने के कारन ऐसी चीजे बनाना उनकी दाये हात का था। ऊपर से घर कोई चोरी होने निशान नहीं। चाकू पे कोई निशान न होने ये सब यहीं दर्शाता हैं की ये सब प्रीप्लान सुसाइड हैं।
सब लोगों का को यकीं हो गया की ये खून नहीं बल्कि आत्महत्या हैं। अमित जी की बिमा के पैसे सुसाइड होने के कारन नहीं मिल पाएं। सब लोग विजय की प्रशंसा करने लगे। हम पर गुस्सा करने वाला इंस्पेक्टर भी विजय की तारीफ करने लगा।
" धन्यवाद विजय ! आज तुम्हारी वजह से हम इस केस को हल कर पाए। फिर जरूर मिलेंगे। "
उस इंस्पेकर ने उसका कार्ड विजय को दिया और मदद मिलने पर बुलाऊंगा ऐसा कहा।
लेकिन इस सब में बेचारे अमित जी की बेमौत जान गयी। अपने बेटे को खुश देखने की लिए उन्होंने अपनी जान भी दे दी। अपनी संतान के सुख के लिए अपने माता पिता अपनी जान की परवा भी नहीं करतें यही इस घटना से साबित होता हैं।
समाप्त !

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