जासूस विजय की कहानियाँ... भुतिया किला PART 4

सुबह होते ही हम उन लड़कों को मिलने गए। विजय उनका हाल पूछा और उनके साथ घटी घटना को बताने को कहा 
" जब हम उस आवाज़ से डरकर वापस आ रहे थे तभी अचानक हमे हमारे ऊपर कुछ मँडराता दिखाई दिया। वो एक आत्मा थीं। उसने हमें रोका  ओर हमारी और बढ़ रही थी। तभी अचानक हमारे सर पर बहुत जोर से कुछ लगा। हम बेहोश हो गए।" उनमें से एक ने घबराते जवाब दिया। 
  हम वहाँ से उस हादसा वाली जगह पर गए। कुछ देर ध्यान से देखने के बाद विजय ने मुझे बुलाया।
"ये देखों राघव यहां पैरों के निशान हैं। यहां कुछ गीली मिट्टी के भी निशान है। "
हाँ विजय सच में!"
"अब बताओ अगर भूत ऊपर घूम रहा था तो ये किसके निशान है"?"
"शायद उन लड़कों के पैरों के हो?"
"लेकिन ये गीली मिट्टी ये दर्शाती हैं कि यहाँ और कोई था जो हम पर नजर रखे था।"
"लेकिन कौन?"
"शायद वही जिसे लगता हैं कि हम इस पहेली की जड़ तक ना पहुंचे।"
   विजय के दिमाग में कुछ चल रहा था । उसने अपना सब सामान साथ में लाया थे । उसने बन्दुक को एक बार चेक किया । 
" राघव तुम एक काम करो । तुम वापस गांव चले जाना । "
"तुम कहा जा रहे हो ?"
में जरा घूम के अत हूँ ।"
"तो फिर मैं भी चलूँगा ।"
"नहीं! उन लोगों क लगाना चाहिए की हम अभी गांव में ही हैं । और तुम सब से कहना की हम कल यहाँ से जाने वाले हैं । ये हमारे बस की बात नहीं ।"
"केलिन तुम अकेले ?"
"मुझे कुछ नहीं होगा तुम जाओ ।"
मैं वहां से निकला थोड़ी देर बाद विजय मुझे दिखना बन्द हुआ ।
मैं राकेश घर आया । 
"विजय कहाँ हैं ?" राकेश ने पूछा ।
"वो पीछे से आ रहा हैं ।और उसने मुझे हमारा सामान बांधने ने को कहा है ।" 
"क्यों क्या हुआ ?"
"विजय का कहना हैं की ये बात उसके बस की नहीं । वो एक मामूली जासूस हैं । कोई तांत्रिक नहीं जो भूतों का सामना करें ।"
 मेरी बात सुनकर राकेश और उसकी माँ बहुत निराश हुए । लेकिन राकेश के पिताजी थोडासा मुस्कुराए । ये बात मेरी आँखों ने पकड़ ली । मुझे कुछ समाज नहीं आया की जिसका बीटा खो गया हो वो कैसे मुस्कुरा सकता है ?
    रात के ठीक ८ बजे होंगे । मैंने हमारा बैग भर  लिया । अब विजय की राह देख रहा था । तभी विजय आया । उसके साथ एक पुलिस ऑफिसर भी था  ।
"राकेश ये  यशवंत शर्मा है ।हमारे जिल्हे के S.P. । "
शर्मा सर को देख कर राकेश के पिताजी थोडा डर गये । और उन्हे न मिले कही  चले गये । 
राकेश ने शर्मा सर सब बात बताई । उसकी मां तो उनके सामने उनके बेटे को बचाने की भिक मांगने लगी ।
शर्मा सर ने उनको विश्वास जताया की वो उनकी हर एक मद्द करेगे ।
"सर हमे अब ऊस किले की और चालना चाहिये । राकेश तुम गाव के सरपंच को लेकरवहाँ आ जाना ।
राकेश तुरंत ही चला गया । हम सब किले की और बढे । रस्ते में मैंने विजय से पूछा ," तुम सुबह से कहाँ थे ? और शर्मा सर को किसने बुलाया ? "
" मैंने  ही उन्हें कॉल करके बुलाया है । "
"लेकिन तुम सुबह से कहा थे ? " 
"चलों सब समझ में आयेगा ।"
मुझे लगा की शायद विजय को कुछ बड़ा सुराग मिला है । हम सब किले के निचे आ गए । विजय और शर्मा सर ने अपनी बन्दुक निकल कर हैट में ली । हम सब ऊपर चढाने लगे । मुझे तो बहुत दर लग रहा था की अगर वहां सच ने ही भुत हो तो हम इस बन्दुक से क्या करेंगे ? ऊपर चढ़ते मैं सोचने लगा की मैं किसलिए यहाँ आया था ? अगर मेरे घरवालों को ये बात पता चली तो मेरी खैर नहीं । एक दिन पहले पहचान हुई विजय के साथ मैं यहाँ इस भुत किले पर चढ़ रहा था । तभी कुछ आवाजे आने लगी । 
" लगता हैं भूतों की पार्टी चल रही हैं । शर्मा सर ने कहा ।
" हाँ सर ! इनको हम आने वाले हैं इसकी खबर ही नहीं मिली  हैं । "
हम जैसे  जैसे किले की नजदीक जाने लगे आवाजे  स्पष्ट रूप से आने लगी । कुछ लोग हंस रहे थे । हम चुपके से उनके बहुत नजदीक गए । उनकी बातचीत सुनाने लगे । 
"यार ये काम कब होगा और हमें ये खजाना कब मिलेगा ? कितने दिनों से हम इस किले की खुदाई कर रहें हैं ! अब हम बहुत थक चुके हैं । अब घर जाना हैं । "
"अगर कोई घर जाना चाहता हे तो उसकी लाश ही यहाँ से जायेगी ।" 
एक बड़ा इंसान चिल्लाते हुए बोल पड़ा । उसकी आवाज सुनते ही सब चोर खामोश हो गए ।
" मैंने यहाँ तुम पर इतने सारे पैसे लुटाकर युहीं नहीं लाया हूँ ! मुझे वो  खजाना चाहिए किसी भी हाल में !"
"लेकिन मालिक और कितने दिन हम खुदाई करेंगे ? यहाँ खजाना तो क्या खजाने की बुँ भी नहीं हैं ।"
उस चोर की बात सुनकर उस इंसान ने उस चोर को पीटने लगा ।
"और कोई हैं यहाँ जो  घर जाना चाहता हैं ?"
सब लोग चुप हो गए । "लख्खा क्या वो शहरी लोंडे चले गांव से ? "
"मालिक कल जाने वाले हैं " वो बहुत डर गए हैं । "
"ठीक हैं । सैलों की वजह से हमारा सारा काम बिघड जाता । उन पर नजर रखना । कोई होश्यारी की तो उनका काम तमाम कर देना  ।"
" इतनी भी क्या जल्दी हैं ठाकुर रणदीप ! जरा हमें मिले तो दें !" विजय ने बन्दुक ताने  जवाब दिया । 
विजय की आवाज से सब लड़खड़ा गए । किसीने विजय पर हमला करने की कोशिश की तभी शर्मा सर ने उसके कंधे पर गोली चला के उसे गिरा दिया । 
सब भागने लगे तभी पुलिस ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया । 
" कोई चालाकी नहीं वरना बे मौत मारे जाओगे । " शर्मा सर ने उन चोरों को चेतावनी दी । 
सब ने अपने हथियार निचे रखे । विजय ने उनके चहरे पर टोर्च दिखाई । तभी वहां राकेश और गांव के सरपंच आ गए ।
" रणदीप तुम यहाँ ? " सरपंच बोल पड़े ।
"तुम यहाँ क्या कर रहे हो ? अच्छा तो ये हैं तुम्हारा राज ! 
शहर का बहाना करके तुम इस खजाने के पीछे पड़े हो" 
"पिताजी आप ?" राकेश बोल उठा 
हमने देखा तो राकेश के पिताजी वहीँ थे उन लोगोँ में । 
अब मुझें सारी बात समझ आ गई। जब से हम गाँव आये थे तबसे राकेश के पिताजी  हम टोंक रहे थे। जब मैंने जाने की बात की तो वो मुस्कुरा उठे। जब विजय रात को आया तब वो वहाँ से चले गए। और यहाँ आ गए थे। 
  तभी ठाकुर रणदीप ने उसके पास की बंदूक स गोली चलाने की कोशिश की । शर्मा सर ने चालाकी से रणदीप के हाँत पर गोली मारी। जिसके कारण रणदीप घायल हो गया। उसे हतकड़ी पहनाई। 
"बच्चे कहाँ है?"
"उस दूसरे कमरे मैं ।" एक चोर ने डर के मारे बताया। 
सब बच्चों को वहां से निकाला गया। उसमे राकेश का छोटा भाई भी था। औऱ गाँव के दूसरे बच्चे भी। 
सबकों पंचायत की जगह लाया गया । उसमेँ वो 4 राखवालदार भी थे।
शर्मा सर ने रणदीप को पूछा कि अब सब को बताओ कि तुम उस किले पर क्या कर रहे थे। 
"हम उस लुटेरों के खजाने को ढूंढ रहे थे। जो उस खंडर में था। "
" जब में शहर गया था । तब वहाँ मुझे एक दोस्त मिला । उसने मुझे बताया कि हमारे गाँव में जो किला हैं उसके खजाने को हैम सब ढूंढ निकलेंगे और सब में मिल बाँट कर लेंगे। जब हम सब उस किले में पहुंचे तो वो बहुत ही टूटा हुआ था। उसने उस किला का नक्शा सरकारी दफ्तरों से चुराया था। जिसकी मुताबिक किले के बीच में एक बड़ा कमर था। जिसमे खजाना होने की आशंका थी। जा। हमने खुदाई की तभी इन 4 ने हमे देख लिया। मैने उनको कुछ हिस्सा देने का लालच दिया और इनको हमारी तरफ किया। दिन भर हैम सब सोते और रात को खुदाई करते। कुछ खुदाई के बाद   3 छोटी सुरंगे मिली  । हम नीचे नही जा सकते थे। तभी हमने गाँव के बच्चों को अग़वा किया। और उनको नीचे खुदाई के लिए भेजा। "

एक दिन राकेश के पिता उसके बेटे को ढूंढते यहाँ आये तो उनको भी हमारा प्लान पता चला । उनको भी हमने खजाने का लालच दिलाया और गांव की खबरें लाने का काम दिया। जब शहर से 2 लड़के आये तो उन्होंने बताया कि वो किले पर जाने वाले हैं। तब हमने भूतों का नाटक किया।"
"नालायक !किस बात की कमी थी तुम्हें जो इस पाप के खजाने के पीछे पड़ा। मुझे तो शर्म आ रहीं तुझे अपना बेटा कहने में ।" 
" मिझे माफ कीजिये पिताजी । मुझसे गलती हो गयी। "
"इंसपेक्टर साहब इन्हें गिरफ्तार कीजिये। और कड़ी सी कड़ी सजा दिलवाये। " सरपंच गुस्से में कहने लगे। 
पुलिस ने उन सब को गिरफ्तार किया ओर पुलिस थाने ले गए। 
राकेश को उसके पिताजी के हरकत से बेहद बुरा लगा। 
सब लोग जाने के बाद विजय ने हमारी मुलाकात शर्मा सर से कराई। ये वही पुलिस ऑफिसर थे जिन्होंने विजय को बढ़ा किया था। 
सब लोग जाने के बाद मैंने विजय से अपने सारे सवाल पूछे। 
"तुम मुझे बताओ कि सुबह से तुम कहाँ थे। तुम्हें कैसे पता चला कि चोरों का मुखिया ठाकुर रणदीप ही है। "
हँस कर  विजय बोला "तुम्हारे जाने के बाद में उस किले पर गया वहां झाड़ियों में छुपा रहा । तभी मुझे किसके आने आहत लगी। मैंने देखा कि वो 4 राखवालदार थे । लेकिन उन्होंने कुछ तो साथ में लाया था। जो वहां ही रख कर चले गए। कुछ देर के बाद एक आदमी आया और ऊसने वो समान उठा के किले में चला गया मैंने उसका पीछा किया। तो अंदर सब सो रहे थे । मैं फिर चुपके से दीवार पर चढ कर देखा तो वहाँ कुछ लड़के भी थे जिनको बाँध के रख्खा था। 
तभी कुछ देर बाद राकेश के पिताजी वहाँ आये। तब मुझे पक्का यकीन हुआ कि मेरा अंदाजा सही हैं। "
"कोनसा अंदाजा?"
"जब हम यहाँ आये थे । तब रात को मैंने देखा कि राकेश के पिता किसीसे फ़ोन पे बात कर रहे थे कि छोटे मालिक संभाल कर रहिये कुछ लड़के आये है शहर से। 
अगले दिन जब मैं गाँव में घूमा तब मुझे पता चला कि ठाकुर रणदीप को छोटे मालिक कहाँ जाता है। उनके बारे मैं ओर जानने के लिए मैं उनके घर गया। तब उनके पिताजी ने बताया कि वो ज्यादा समय गांव के बाहर रहते हैं। 3 4 दिन में एक बार आते हैं और कुछ पैसे लेकर जाते हैं। जब मैं वहाँ निकल रहा था तभी वो 4 व्हीलर में आ गए। मुझे न बोले घर गए और कुछ ही देर में चले गए। लेकिन जाते समय वो दूसरे रास्ते से चले गए। जो उस किले की पीछे से जाता हैं। "
"लेकिन वहाँ क्यों?रास्ता तो यहाँ का अच्छा है ना !"
"हाँ ! लेकिन उनको उस किले में जो जाना था।" मतलब किले का पिछला हिस्सा एकदम छोटा है। वहां जाने के लिये रास्ता भी हैं। जब मैं वहाँ पहुंच गया तब मैंने वहां गाड़ी की टायर के निशान देखें जो बिल्कुल रणदीप के गाड़ी के निशानों से मिलते हैं। तब मुझे पूरा यकीन हुआ कि क़ुछ तो जरूर चल रहा है। मैंने तुम्हें इस लिये हम जा रहे हैं कहने को कहा कि उनको लगे कि हम डर गए हैं और वो हमारे ऊपर से उनका ध्यान हटाएँ। ताकि मैं अपना काम कर सकूँ। "
"वाह!क्या बात हैं। मां गया तुम्हें। क्या दिमाग पाया हैं। अब क्या करना है कॉलेज तो 2 दिनों बाद शुरू होने वाला हैं। "
"कुछ नहीं अब सोयेंगे और कल किला देखने बाद वापस चले जाएंगे।वैसे किला बहुत ही सुन्दर  है देखने के लिये। "
 हमने किला देखा सच में बहुत ही शानदार और आकर्षक था। उस किले को पंचायत ने गाँव के लिए खोल दिया। उस किले की मर्मद करके एक प्रेक्षणीय स्थल के रूप मे खोला गया। उस खजाने का राज आज भी पता नहीं चला। सब गाँव वालों ने उसे ना ढूंढ़ने का फैसला एक साथ किया। हम भी अब कॉलेज में घूल मिल गए। विजय भी किसी केस में पुलिस की मदद करता रहता हैं।














विशेष टिप :

प्रिय वाचकगण मेरा ये पहला ही प्रयास हैं। मैं आपके लिए जासूस विजय की कहानियाँ लाता रहुँगा। मेरे इस प्रयास के बारे आपके सुझाव मुझे जरूर बताएं। अपने दोस्तों को ये कहानियां शेर करें। आपका प्यार मुझें ओर  कहानिया लिखने में उत्साह देता रहेगा। 
आपका प्यारा  दोस्त 





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