एक था राजकुमार PART 3

" क्या हुआ राजकुमार ? किस बारे में बात कर रहें हैं आप ?"
" अब भोले बनने का नाटक ना करें मामाजी ! सब कुछ पता होकर भी आपने मुझे अँधेरे में रखा !"
" आप किस बारें बात कर रहें हैं ? कृपा करके विस्तार से बताये। "
" क्या आपको पता नहीं की मेरा विवाह सरु ने नहीं बल्कि महाराज  की बड़ी बहन की बेटी मधुमती से होने वाला हैं ?"
" क्या ! ये क्या बोल रहें हैं आप ? लेकिन अपने तो खुद ही कहाँ था की महाराज ने तो सरस्वती को पसंद किया हैं !"
" हाँ! मुझे भी पहले ऐसा ही लगा की वो सरस्वती के बारें में बात कर रहें हैं।"
" मेरा यकीन कीजिये राजकुमार ! मुझे भी नहीं पता की महाराज ने आपके लिए मधुमती को पसंद किया हैं। "
मामाजी की बात सुनकर राजकुमार थोड़ा शांत हो गए।  उनको उनकी हरकत पर शर्मिंदगी महसूस हो गई। 
" हमें क्षमा करें मामाजी ! मुझे लगा की आपको पता होगा। लेकिन अपने मुझे नहीं बताया। "
" नहीं राजकुमार ऐसी कोई बात नहीं।  अगर मुझे पता होता तो मुझे आपसे तुरन्त बता देता। "
कुछ समय विचार के बबाद राजकुमार ने कहाँ," मामाजी अब क्या करें ? महाराज को कैसे बताये की मैं मधुमती से नहीं बल्कि सरसवती से विवाह करने के लिए राजी थे। "
" मुझे भी नहीं समज आ रहां की उनसे कैसे बात करें।  "
"मामाजी कुछ करिये।  मैंने सरु से वडा किया हैं की मैं सिर्फ उसीसे ही विवाह करूंगा। उसके सिवा किसी और के बारे में मैं विचार भी नहीं कर सकता। "
  मामाजी ने महाराज से बात करने का कहाँ।  मामाजी महाराज के कक्षा में गए।  
" महाराज !"
" आइये मामाजी कैसे आना हुआँ ? तैयारियाँ कैसी चल रही हे विवाह की ? कोई कमी नहीं रहनी चाहिए विवाह में। "
" जी महाराज। लेकिन.... "
" लेकिन क्या ? "
" महाराज क्षमा करें।  क्या राजकुमार अर्जुन को पता हैं की , उनका विवाह मधुमती से होने वाला हैं। "
" मतलब ? हमने उनसे बात की हैं।  वो भी इस विवाह के लिए राजी हैं। "
" लेकिन महाराज वो.... "
" क्या वो ? मामाजी जो भी हैं स्पष्ट बोलिये। "
"  वो  किसी और को ही  वह लड़की समज बैठे हैं। "
" मतलब ? मैंने उनसे कहाँ था की उन्होंने उसे बचपन में देखा हैं।  हमारे पास की हैं। "
" लेकिन महाराज उनको लगा की वो आप सरस्वती यानि प्रधानमत्री की बेटी के बारे में बात कर रहें थे। "
" क्या ? क्या मूर्खता हैं ये ? क्या राजकुमार पागल हो गए हैं?"
" क्षमा करें महाराज वो सरस्वती से प्यार करते हैं और उनका कहना हैं की वो सिर्फ उसीसे ही  विवाह करेंगे। "
" मामाजी ! क्या बोल रहे हैं आप ?'
महाराज क्रोध से लाल हो गए।  
" राजकुमार को बुलाये "
नौकरो द्वारा राजकुमार अर्जुन को महाराज के कक्षा में बुलाया गया।  साथ में प्रधान मंत्री को भी बुलाया गया। 
" महाराज आपने मुझे बुलाया।  " राजकुमार अर्जुन।  
" आइये चिरंजीव।  लगता आपने हमको सरे राज्य के सामने अपमानित करने की प्रतिज्ञा ली हैं। "
"क्षमा करें महाराज।  मैं आपकी बात समझ नहीं पाया ।  "
"  क्या आपको पता  था की मैंने आपके लिए हमारी बड़ी बहन की बेटी मधुमती को विवाह के लिए पसंद किया हैं। "
" नहीं महाराज ! मुझे  लगा  आप सरस्वती.... "
"खामोश ! "
तभी प्रधानमंत्री भी वहाँ आ गए। 
" प्रणाम महाराज ! अपने हमें याद  किया।  कहिये  हुक्म हैं?"
" प्रधानमंत्रीजी  ! क्या अपने आपकी बेटी को ये नहीं बताया की अपनी हैसियत से ही विचार करना चाहिए।  बड़े सपने देखना जो हकीकत में कभी सच नहीं होते उनके बारे में सोचन नहीं चाहिए। "
" क्षमा करें महाराज ! क्या मेरी बेटी से कोई गलती हो  गई क्या ?"
" गलती !  अपराध किया हैं आपकी बेटी ने !"
प्रधानमंत्री महाराज की बात सुनकर  चौंक गए।  
" महाराज क्या किया मेरी बेटी ने ?"
"   आपकी बेटी ने राजकुमार  अर्जुन से प्रेम करने का दुःसाहस किया हैं। "
प्रधानमंत्री को बड़ा आश्चर्य हो गया। 
" क्षमा करें महाराज ! मेरी सरस्वती ऐसा नहीं कर सकती।  आपको गलत जानकारी मिली हैं। "
" प्रधानजी हम आपकी बहुत ही इज्जत करते हैं।  अपने आपकी सारा जीवन हमारे राज्य को बढाने ने और समृद्ध बनाने में खर्च किया हैं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं की आप आपकी औकात भूल जाई। "
महाराज की बात प्रधानमंत्री के मन छू गई।  
" महाराज इनको कुछ नहीं पता। " राजकुमार अर्जुन ने कहा। 
" पता कैसे नहीं? अपनी बेटी क्या करती हैं और क्या नहीं ये अपने पिता को कैसे नहीं पता ?"
"महाराज मेरी बेटी की गलती के लिए  मैं आपसे क्षमा मांगता हूँ।  "
प्रधानजी ने अपनी सर की पगड़ी महाराज के पैरो पर रख दी। महाराज ने उस पगड़ी को ठोकर मर दी।  राजकुमार को बहुत ही बुरा लगा। महाराज ने प्रधानमंत्री को नौकरी से निकाल दिया। 
 "जाइये अगर जरा भी शर्म हो तो हमें फिर आपका मुहं ना दिखाइए। "   महाराज ने बड़े गुस्से से कहाँ।  प्रधानमंत्री वहाँ  से गए।  
" मामाजी ! राजकुमार को  बताये की उनका विवाह सिर्फ मधुमती से ही होगा। "
महाराज की प्रधानजी के प्रति असभ्य व्यवहार से गुस्सा होकर राजकुमार वहां चले गए।  मामाजी भी उनके पीछे गए। 
" मामाजी ! चाहे कुछ भी हो हम विवाह सिर्फ सरस्वती से ही करेंगे।  चाहे हमारी जान ही क्यों न जाये। "
" नहीं राजकुमार ऐसा ना कहें ! शांत हो जाइये। "
 उधर प्रधानमंत्री उनके घर पहुँच गए।  
"  सरस्वती ! कहाँ हो ?"
" क्या हुआ पिताजी ?"
" यहाँ आना बेटी जरा।  मुझे बता देना  बचपन से किसी बात के लिए रोक लगायी या विरोध किया ?"
" नहीं पिताजी ! बल्कि हर काम में अपने मेरा साथ दिया।  "
" तो तुम राजकुमार से प्रेम करती हों ये बात मुझसे क्यों छुपाई ?"
" पिताजी मुझे लगा की आपको महाराज ने बताया होगा।  "
" नहीं  बेटी ! महाराज ने तो मुझको काम से निकल दिया। "
" लेकिन क्यों पिताजी?"
" बेटी तुम्हारे और राजकुमार के बारे में  चला। "
" लेकिन उन्होंने  तो  हमारे विवाह के लिए अनुमति दी हैं ना !"
" नहीं बेटी ! महाराज ने राजकुमार का विवाह उनकी बहन की बेटी मधुमती से तय किया हैं । " 
"क्या ? " मधुमती को बड़ा आश्चर्य लगा।  
" लेकिन पिताजी राजकुमार ने कहाँ की..... "
" उनको भी लगा था की उनका विवाह तुम्हारे साथ ही निश्चित हुआ  हैं। लेकिन ये उनका भ्रम था बेटी। "
सरस्वती को बहुत बुरा लगा।  वो अंदर से टूंट गयी।  सरे सपने जो उसने सजाये थे वो सब एक ही पल में चूर हों गए।  उसको रोना आ रहा था लेकिन पिताजी के सामने नहीं रोईं। 
" अब क्या करें ?" सरस्वती के माँ ने कहाँ। 
"हमें ये राज्य छोड़ के जाना होगा। "
सरस्वती एक बा राजकुमार को मिलाना चाहती थी।  उसको पता था राजकुमार को बड़ा सदमा पहुंचा होगा। लेकिन पाटजी के मना करने पर वो कुछ नहीं कर पायी।  उन्होंने अपना सारा सामान लेकर राज्य के एक छोर पर छोटीसी पहाड़ वाली जगह चले गएँ।  सरस्वती अपना व्यवहार   वो अंदर से सिर्फ राजकुमार के  बारे में ही सोचती रहती।  उधर राजकुमार अर्जुन का हाल भी अलग नहीं था।  दिन रात सरस्वती के बारे में सोंच कर उन्होंने अपना स्वास्थ बिघड लिया।  वो बीमार हो गएँ।  भोजन करना छोड़ दिया।  हर पल सरस्वती का विचार उनके मन में था।  
" राजकुमार कुछ कह लीजिये।  भोजन के बिना आपका स्वास्थ और भी बिघड रहा हैं।  "
" नहीं मामाजी ! हमें कुछ नहीं चाहिए।  जीने की इच्छा ही नहीं रही।  आज हमें हमारी माँ की बहुत याद आ रही हैं।  आज वो होती तो शायद हमारा ये हल ना होता। "
दिन बाईट जा रहे थे।  राजकुमार की तबियतबिघडती  जा रहीं थी।  अब महाराज को भी राजकुमार की चिंता होने लगी। 
" मामाजी ,राजकुमार को समझाइये की वो अपनी जिद छोड़े।  भोजन करें। "
" महाराज हमने बहुत प्रयास किया लेकिन वो नहीं मान रहें।  अगर आप कहें तो कुछ असर हो जाएँ। "
महाराज राजकुमार अर्जुन को मिलाने गए।  
"राजकुमार , छोड़ दे अपनी जिद।  भोजन करें।  "
"नहीं महाराज , हमें जीने की कोई चाह नहीं रहीं।  हमने बचपन से हर एक बात मानीं।  खभी आपका मन नहीं दुखाया।  माँ की कमी भी हमने आपसे नहीं बताई। अगर हमारी माँ आज होती तो शायद .... "  
आज पहली बार महाराज को अपने बेटों का दर्द महसूस हुआ।  राज्य व्यवहार में व्यस्त रहने के कारन वो अपने बेटों को समय भी नहीं दे पाए थे।  उनकी माँ की याद ही उनका जीने का सहारा था।  
   आज महाराज को भी उनकी पत्नी का स्मरण हुआ।  उन्होंने उससे किया वादा याद आया की वो अपने बच्चों हर सपना पूरा करेंगे। महाराज अपनी जगह पर उठ गए।  
" मामाजी रथ तैयार कीजिये। "
महाराज खुद प्रधानमंत्री से मिलाने चल गए।  
महारज को खुद अपने घर आते देख प्रधानजी चिंतित हुए। 
महाराज एते ही उन्होंने महाराज को नमस्कार किया। 
"महाराज आप स्वयं ? अगर आप संदेसा सेट तो मई खुद आपसे मिलाने आता। "" काम ही इतना महत्वपूर्ण था की हमें ही आना था। सरस्वती को बुलाइये। "
सरस्वती बाहर आई।  महाराज ने उसे अच्छी तरह से देखा।  उसके सामने हंट जोड़कर , " बेटी , मुझे माफ़  माफ़ कर दो।  मैं तुम्हारे सच्चे प्रेम को समझ नहीं पाया।  मैंने स्वार्थ का नाम देकर मैंने तुमको और तुम्हारी पिताजी को भला बुरा कहाँ।  चलो बेटी , मैं तुम्हे अपने घर की बहुँ बनाना छठा हूँ।  "
महाराज की बातें सुनकर सब खुश हो गए।  
" महाराज आप क्षमा ना मांगे ! आप इस राज्य के महाराज हैं।  "
" प्रधानजी, मैं यहाँ राज्य का राजा बनाकर नहीं बल्कि एक बेटे का पिता बनाकर आपकी बेटी का हात मांगने आया हूँ।  मैंने जो आपसे कुछ बुरा कहाँ उसके लिए मुझे क्षमा करें।  मेरे बेटे के लिए सरस्वती के बिना और कोई हो ही नहीं सकती। "
सबने महाराज का जयजयकार किया।  बड़े धूमधाम से प्रधानजी का और सरस्वती का स्वागत किया।  सरस्वती तुरन्त राजकुमार को मिलने गयी।  
" राजकुमार ! राजकुमार ! उठियें।  मैं आ गयी। 
हलके नज़रों से राजकुमार ने सरस्वती को देखा।  उनको यकीं ही नहीं हो रहा था की सरस्वती खुद ये हैं या उनको भ्रम हो रहा हैं।  
" सरु तुम ?"
" हाँ राजकुमार ! मैं आयी हूँ। "
" लेकिन तू यहाँ कैसे ?'
" महाराज खुद हमें यहाँ लेके ए हैं।  उन्होंने हमारे विवाह के लिए भी अनुमति दी हैं। "
तभी महाराज खुद वहां  आ गए।  
" हाँ  राजकुमार, मुझे मेरी गलती का एहसास हुआ हैं। अब आप जल्दी थोक हों जाये। हम अच्छा समय देख कर सरस्वती और आपका विवाह कर देंगे।  "
" लेकिन महाराज , मधुमती.... "
"उसकी चिंता आप ना करें।  हम देख लेंगे।  "

कुछ दिनों बाद राजकुमार अछे  हो गए।  सरस्वती और राजकुमार अर्जुन का विवाह संपन्न हो गया ।  राज्य का उत्तराधिकारी के रूप में राजकुमार अर्जुन अब महाराज अर्जुन हो गए।  महारानी सरस्वती साथ उन्होंने अपने राज्य का प्रशासन और विस्तार कर लिया और अपने पिताजी का सपना पूरा कर लिया।  





  (समाप्त )





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